अररिया- टीबी संक्रमण को दो बार मात देकर आज टीबी मरीजों की सेवा में जुटे हैं दामोदर।

  • सकारात्मक नजरिया व मजबूत हौसले के दम पर सेहत से जुड़ी चुनौती को दी मात।
  • स्वास्थ्य विभाग से जुड़ कर टीबी उन्मूलन के प्रयासों को दे रहे हैं मजबूती

अररिया, 24 नवंबर । बीएससी ऑनर्स की पढ़ाई के दौरान एक बार दामोदर गंभीर रूप से बीमार हो गये। बुखार था जो छूट नहीं रहा था। कई दिन बीमार रहने के बाद एक दिन उनके मुंह से खून आना शुरू हो गया। दोमादर ही नहीं, उनके परिवार वाले भी इससे बेहद चिंतित हो उठे। तत्काल गांव के एक चिकित्सक के पास उन्हें इलाज के लिये ले जाया गया। कुछ दिन दवा चलने के बाद भी सेहत में कोई सुधार नहीं होता देख उन्हें पूर्णियां के निजी चिकित्सक के पास ले जाया गया। जरूरी जांच के बाद चिकित्सक ने फेफडे की टीबी होने की बात कही। टीबी का नाम सुनते ही दामोदर व उनके परिवार वालों पर मानो विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। लोगों ने तो उनके जीवित बचने तक की उम्मीद छोड़ दी।

टीबी को लेकर गलत धारणाओं को त्यागना जरूरी

जिला यक्ष्मा नियंत्रण केंद्र में जिला टीबी व एड्स कार्डिनेटर पद पर कार्यरत दामोदर अभी भी उस वाकये को याद कर भावुक हो उठते हैं। बताते हैं कि चिकित्सक ने उन्हें छह-सात महीने लगातार दवा खाने को कहा। लेकिन टीबी को लेकर उनके मन में पूर्वधारणा कि इससे कोई नहीं बचता, था। हताशा व निराशा से भरे इस दौर में भी दामोदर ने हिम्मत नहीं हारी। चिकित्सक के परामर्श पर उन्होंने नियमित दवा का सेवन शुरू किया। इससे सेहत में सुधार दिखने लगा । तो उन्होंने फिर अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई-लिखाई पर केंद्रित कर लिया।

रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने का लिया संकल्प

टीबी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए दामोदर ने अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे बचाव संबंधी उपायों के प्रति जागरूक करने का संकल्प ले लिया है। इस क्रम में उन्हें पल्स पोलियो अभियान से जुड़ने का मौका मिल गया। स्वास्थ्य संबंधी समस्या से जूझने के बावजूद दामोदर ने इसे अपने लिये एक अवसर के तौर पर देखा। वे नहीं चाहते थे कि किसी दूसरे व्यक्ति को भी रोग से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़े। इस क्रम में स्वास्थ्य विभाग मधेपुरा के जिला यक्ष्मा केंद्र में एटीएस पद पर बहाली का विज्ञापन निकला. इस पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने इसके लिये अपना फॉर्म भरा। दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों दामोदर की तबीयत ज्यादा बिगड़ गयी। जांच में ग्लैंड टीबी होने का पता चला। लेकिन इस बार भी दामोदर घबराये नहीं। उन्होंने इस चुनौती को भी सफलता पूर्वक मात दी। फिर वर्ष 2005 में एटीटीएस के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। उनके लिये ये एक बेहतर अवसर था। फिर 2011 में उनकी नियुक्ति जिला यक्ष्मा केंद्र अररिया में डीसी टीबी व एड्स के पद पर हुई। तब से वे जिले में टीबी मरीजों तक जरूरी सहायता पहुंचाने के कार्य में जुटे हैं।

जागरूकता का अभाव है कई बीमारियों की वजह

दामोदर बताते हैं कि लंबी बीमारी के दौरान उन्हें ये महसूस हुआ कि अधिकांश बीमारियों का कारण रोग के प्रति आम लोगों में जागरूकता का अभाव है। रोग की समुचित जानकारी व बचाव संबंधी उपायों के प्रति जागरूक कर लोगों को कई रोगों से बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि टीबी का इलाज अब पहले की तुलना में बेहद आसान हो चुका है। हर सरकारी चिकित्सा संस्थान में नि:शुल्क जांच व इलाज का इंतजाम है। मरीजों के लिये कई कल्याणकारी योजनायें संचालित हैं । केंद्र सरकार ने वर्ष 2025 तक देश से टीबी को पूरी तरह खत्म करने का संकल्प लिया है। टीबी के इलाज में दवा का नियमित सेवन महत्वपूर्ण है। उन्होंने सामान्य लक्षण दिखने पर भी नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जांच व तत्काल इलाज की अपील आम लोगों से की।

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