अररिया- सुविधाएं बढ़ी तो प्रसव के लिये सरकारी संस्थानों पर बढ़ा लोगों का भरोसा।

  • जिले में मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का हो रहा सतत प्रयास।
  • बीते दो साल में संस्थागत प्रसव के मामले में 15 से 20 फीसदी की हुई है बढ़ोतरी

अररिया, 21 सिंतबर । जिले में मातृ व शिशु संबंधी स्वास्थ्य सेवाएं हमेशा जटिलताओं से भरा रहा है। सघन आबादी, उच्च प्रजनन, गरीबी, अशिक्षा व कम उम्र में युवतियों की शादी की वजह से मातृ मृत्यु दर का अनुपात राज्य के अन्य जिलों की तुलना में अधिक है। जिले का मातृ मृत्यु दर यानि एमएमआर रेट 177 है। वहीं नवजात मृत्यु दर यानि आईएमआर 43 है। जो राज्य के औसत से काफी अधिक है। एमएमआर प्रति एक लाख जीवित बर्थ पर होने वाले महिलाओं की मौत का दर्शाता है। वहीं आईएमआर प्रति एक हजार बच्चों के जन्म पर होने वाली मौत की संख्या को दर्शाता है। गौरतलब है कि मातृ मृत्यु व नवजात मृत्यु दर के मामलों में कमी लाने को लेकर हाल के दिनों में युद्ध स्तर पर प्रयास संचालित किये जा रहे हैं। इसे लेकर प्रथम तिमाही में गर्भवती महिलाओं की पहचान, चार एएनसी जांच व संस्थागत प्रसव सुनिश्चित कराने सहित कई अन्य इंतजाम किये गये हैं। लिहाजा संस्थागत प्रसव संबंधी मामलों में हाल के दिनों में अपेक्षित सुधार देखा जा रहा है।

बीते दो सालों में 15 से 20 फीसदी का हुआ गुणात्मक सुधार

2019-20 में जारी एनएफएचएस 04 की रिपोर्ट के मुताबिक जिले में प्रसव संबंधी 51।9 फीसदी मामलों का निष्पादन संस्थागत हो रहा था। जो 2019-20 में जारी एनएफएचएस 05 की रिपेार्ट में बढ़ कर 61।6 हो चुका है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिये बीते दो साल के दौरान जिले में युद्धस्तर पर प्रयास किये गये हैं। लिहाजा इस दौरान संस्थागत प्रसव संबंधी मामले में 15 से 20 फीसदी गुणात्मक सुधार देखा जा रहा है। विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020-21 में जहां जिले में संस्थागत रूप से 69 हजार 313 प्रसव मामलों का निष्पादन हुआ। वहीं वर्ष 2022 में अब तक 58 हजार 632 प्रसव संबंधी मामलों का निष्पादन संस्थागत रूप से हो चुका है।

प्रभावी साबित हो रहा है कारगर रणनीति व सामूहिक प्रयास
सिविल सर्जन डॉ विधानचंद्र सिंह बताते हैं संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में विभाग की कारगर रणनीति कर्मियों का सामूहिक प्रयास बेहद प्रभावी साबित हो रहा है। समुदाय स्तर पर काम करने वाली आशा कार्यकर्ताओं से लेकर लेबर रूम में प्रतिनियुक्त कर्मियों के क्षमता संर्वद्धन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इतना ही नहीं प्रथम तिमाही के दौरान गर्भवती महिलाओं की पहचान को लेकर भी युद्धस्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। ताकि गर्भवती महिलाओं से संबंधित बेहतर डेटा का संधारण संभावित हो सके। इसे लेकर हर कदम बढ़ते कदम नाम से विशेष अभियान संचालित किये जाने की जानकारी उन्होंने दी।

एएनसी के अनुपात में संस्थागत प्रसव प्राथमिकता

डीपीएम स्वास्थ्य ने बताया एएनसी को प्रमुखता देने से स्थिति में बदलाव संभव हुआ है। जिला स्तरीय लक्ष्य को प्रखंड व प्रखंड स्तरीय लक्ष्य को वीएचएसएनडी सत्र के मुताबिक बांटा गया। प्रत्येक सत्र पर कम से कम 16 एएनएसी का लक्ष्य दिया गया। इससे इसमें चारों एएनएनसी के मामलों में 20 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी संभव हो सका। अब संस्थागत प्रसव को बढ़ाने के लिेय चतुर्थ एएनसी के अनुपात में संस्थागत प्रसव सुनिश्चित कराने को लेकर युद्धस्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। प्रसव संबंधी सुविधाओं को भी विस्तारित किया गया है। पूर्व में जहां जिले में 31 एलआर सेंटर थे। वहीं वर्तमान में इसकी संख्या बढ़ कर 62 हो चुकी है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में ग्रामीण इलाकों में संचालित हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। प्रत्येक माह हर एक प्रखंड में एक वेलनेस सेंटर पर प्रसव सेवा बहाल करने को लेकर काम किया जा रहा है। अगस्त माह में 1200 से अधिक प्रसव महज वेलनेस सेंटर पर संभव हो पाया है।

नजदीक में मिले सुविधा तो लोगों की आपत्तियां होगी कम

आशा कार्यकर्ता उर्मिला झा बताती हैं कि सरकारी अस्पतालों में भी प्रसव सेवाएं बेहतर हुई है। बावजूद इसके स्वास्थ्य संस्थानों से घर की दूरी, खराब सड़क, बाढ़-पानी जैसी समस्याओं की वजह से दूर दराज के संस्थानों में प्रसव के लिये जाने से लोग घबराते हैं। जो गृह प्रसव के बड़े कारणों में से एक है। घर के नजदीक लोगों को बेहतर सुविधा मिले तो संस्थागत प्रसव के मामले में और सुधार संभव है। वेलनेस सेंटर इसका बेहतर विकल्प है। वहीं प्रसव के लिये अररिया सदर अस्पताल पहुंची मालती देवी कहती है कि मेरा पहला प्रसव भी अस्पताल में ही हुआ था। कर्मियों का व्यवहार, अस्पताल का इंतजाम से मैं ओर मेरा पूरा परिवार को मिली संतुष्टी के कारण ही दूसरे प्रसव के लिये भी अस्पताल आयी हूं।

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